छठ स्पेशल : हमारे ‘ठेकुआ’ की कहानी

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लाइव सिटीज डेस्क : गुगल पर ठेकुआ (thekua) सर्च कीजिए. हिंदी अथवा अंग्रेजी, किसी भी भाषा में. तस्वीर के साथ ठेकुआ आपके सामने होगा. बनाने की विधि से लेकर अपने इतिहास को बताता हुआ हमारा ठेकुआ अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है. इस बिहारी रेसिपी के बारे में भारत ही नहीं, दुनिया भर के लोग जानते हैं. वैसे तो ठेकुआ हमारे यहां के हर पर्व-त्योहार में बनने वाला विशेष पकवान है, मगर बिहारियों के महापर्व छठ के समय बनने वाले ठेकुआ की प्रसिद्धि चहुंओर है. लोकआस्था  का महापर्व छठ के दौरान बनने वाला ठेकुआ पकवान नहीं होकर प्रसाद का रूप ले लेता है, जो देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी बतौर छठ का प्रसाद बन कर पहुंचता है. दीपावली (सोहराई) बीत चुका है और घरों में छठ की तैयारियां अभी से ही शुरू हो गयी हैं, इसीलिए लाइव सिटीज अपनी जिम्मेवारी समझ कर आपके सामने रख रही है ‘अपने ठेकुआ की कहानी’ –

ठेकुआ कब आया? पहली बार कब बना होगा? क्या सोचकर किसी ने इस व्यंजन को बनाया होगा? ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जो ठेकुआ की कहानी कहने और जानने के समय निकल आएंगी. इन सबका एक ही जवाब है और वह यह कि ठेकुआ हमारे यहां तब से है, जब से हमने खाना बनाकर खाना सीखा होगा. जब हमने तेल में तल कर खाना बनाना शुरू किया होगा. पहली बार तब बना होगा, जब किसी को अपने यहां के लोगों को तला हुआ कुछ खाने का मन किया होगा. आटे को गूंध कर स्वादानुसार शक्कर डालकर बस तलना ही तो होगा. बस वहीं से तो आया होगा हमारा ठेकुआ.

कैसे बन गया रेसिपी ?

रेसिपी नाम सुन कर ऐसा लगता है कि हम किसी अलग तरह से बने व्यंजन की बात कर रहे हैं. मगर, अपना ठेकुआ तो अलग तरह का व्यंजन नहीं है, जो किसी खास विधि से ही बनायी जाती हो. फिर ये रेसिपी कैसे बन गया? दरअसल इसके पीछे भी एक कहानी है. जो पहले तो गुंधे हुए आटे को एक रूप देकर तलने से शुरू हुआ बाद में एक विशेष तरह का आकार ले लिया. बनाते-बनाते किसी ने मुलायम बना दिया, तो किसी ने कठोर. कठोर वाला आजकल खजूर के नाम से जाना जाने लगा है. मुलायम वाला आज भी ठेकुआ के नाम से जाना जाता है. जैसे तेल (सरसो, रिफाइन्ड, घी)  में तलियेगा, स्वाद बदलता चला जायेगा. प्रयोगों और नवोन्मेष के दौर में आटे में मैदा मिला कर ठेकुआ बनाया जाने लगा. मगर, खालिस आटे का शुद्ध घी में तला ठेकुआ सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला है. और शायद इसी तरह के ठेकुआ ने इसे रेसिपी का दर्जा दिला दिया.

ठेकुआ ही क्यों?

पकवान बनाने ही थे तो ठेकुआ ही क्यूं बनाया गया? सवाल वाजीब भी है. लेकिन इसका जवाब महज इतना ही है कि आप ठेकुआ पांच दिनों के बाद भी खाइएगा तो वही स्वाद आएगा. इतनी देरी में तो रेफ्रिजरेटर में रखी मिठाई भी खराब हो जाती है. पहले ग्रामीण इलाकों में कहां किसी के पास रेफ्रिजरेटर होता था. दूसरी बात यह कि आज समय में हर सामान को पोर्टेबल बनाने की चाहत में व्यंजनों के संदर्भ में ठेकुआ नजीर पेश करता है. एक ऐसा व्यंजन जिसके लिए किसी दूसरी रेसिपी की जरूरत ही नहीं पड़ती. झोला में डाल कर चल पड़ें या सुटकेस में, ठेकुआ कहीं भी और कैसे भी जा सकता है. तीसरी सबसे खास बात है कि ठेकुआ खुद में ही एक पकवान है. तो कहीं खाने, दिखाने और बताने में संकोच नहीं आता.

पहले का ठेकुआ

पहले हमारे यहां इतने होटल, परिवहन के साधन और खाने को लेकर अन्य तमाम विकल्प नहीं मौजूद होते. यदि कोई कहीं जा रहा है, तो ठेकुआ लेकर निकल गया. हफ्ते भर की भी यात्रा हो अथवा आज के जमाने में कहे जाने वाला टूर हो, ठेकुआ भूख मिटाने का सबसे बेहतर साधन होता था. करीब 90 साल के वृद्ध महुली के केदार सिंह बताते हैं कि जब हम बच्चे थे और कहीं जाना होता, तो घर वाले पोटली में ठेकुआ बांध कर दे देते. रास्ते भर खाने के लिए नहीं सोचना पड़ता. उसी तरह जब लौटना होता, तो उधर से भी ठेकुआ ही दिया जाता. गाड़ियां कम थीं. छोटी दूरी तय करने में भी दो से तीन दिनों का वक्त लगता. ठेकुआ खाने के लिए कहीं रुकना नहीं पड़ता. खाते-खाते भी दो-चार कोस तय कर लेते थे.

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छठ का ठेकुआ सबसे बेहतर

छठ के प्रसाद में यदि ठेकुआ नहीं मिले तो वह प्रसाद अधूरा है. ऐसी मान्यता है कि भगवान सूर्य को भी ठेकुआ बहुत प्यारा है. इसीलिए इस दौरान बना ठेकुआ सबसे स्वादिष्ट बनाया जाता है. शुद्ध घी का बना ये ठेकुआ शक्कर में नहीं बन कर गुड़ में बनता है. स्वाद अनोखा हो जाता है. गुड़ का ठेकुआ खास तौर पर छठ में ही बनता है. शुद्ध घी में तले जाने के कारण ये काफी मुलायम भी होता है.

छठ के बाद घर से लौट रहे हैं तो ठेकुआ लेना नहीं भूलें

यदि आप कहीं से पूजा करके आ रहे हैं तो लोग प्रसाद मांगेंगे ही. ऐसे में जब आप छठ की पूजा के बाद घर से लौट रहे हैं, तो ठेकुआ लेना नहीं भूलें. बिना ठेकुआ को प्रसाद अधुरा होगा. अर्घ्य देते समय अन्न होते हुए भी ठेकुआ सूर्य देवता के चढ़ावे में शामिल होता है. images-1और अब तो फेमस भी हो चुका है, इसीलिए ठेकुआ का प्रसाद देना मस्ट है. बिहार से बाहर किसी अन्य राज्य में जाना हो या विदेश में, सफर रात भर का हो या चार रात लगे, ठेकुआ ज्यों-का-त्यों रहेगा, बिना किसी खराबी के, जबकि दूसरे प्रसाद खराब भी हो सकते हैं.

छठ का ठेकुआ मधुर गीत की लय पर बनता है

छठ के ठेकुआ की एक और खास बात है. ये हमारे यहां लोकगीतों की मधुर तान पर बनता है. छठव्रती महिलाएं जब ठेकुआ बनाती हैं, तो अकेले हों या समूह में, छठ के गीत गुनगुनाते रहती हैं. सूर्य देवता के प्रसाद की तैयारी करते समय गीत गाना हमारी परंपरा में शामिल हैं.

यह रही हमारे ठेकुआ की कहानी. यदि पहले से वाकिफ हैं, तो छठ के प्रसाद में ठेकुआ नहीं मिले तो एक बार टोकिएगा जरूर. यदि नहीं जानते तो गुगल पर खंगाल लीजिए. खुद से भी अपने घर में बना कर खा सकते हैं. संबंधियों को भी खिला सकते हैं. इति‍ श्री ठेकुआ कथा.

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